नई दिल्ली: नीट पेपर लीक के विरोध में जंतर-मंतर और देशभर में हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान दर्ज मामलों को लेकर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट कहा कि निर्दोष छात्रों और गंभीर आपराधिक आरोपों वाले लोगों के मामलों को अलग-अलग देखा जाना चाहिए। अदालत ने यह भी दोहराया कि हत्या, दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराधों के आरोपियों को किसी भी स्थिति में राहत नहीं दी जाएगी।
घायल पुलिसकर्मियों के परिवार भी बने पक्षकार बनने के इच्छुक
सुनवाई के दौरान जंतर-मंतर प्रदर्शन में घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिवारों ने भी आवेदन दाखिल कर मामले में पक्षकार बनाए जाने की मांग की। उन्होंने अदालत से ड्यूटी के दौरान पुलिसकर्मियों पर हमला करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश देने की अपील की।
सरकार से मांगा सभी राज्यों की एफआईआर का ब्यौरा
सुनवाई के दौरान प्रदर्शनकारी छात्रों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने कहा कि छात्रों के भविष्य को देखते हुए दर्ज एफआईआर वापस लेने या निरस्त करने पर स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए। उन्होंने पटना में दर्ज उस एफआईआर का भी उल्लेख किया, जिसमें 152 नामजद और 5,000 अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया गया है।
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने केंद्र सरकार से दिल्ली सहित अन्य राज्यों में दर्ज सभी एफआईआर का पूरा विवरण उपलब्ध कराने को कहा। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार अपने पहले दिए गए आश्वासन पर कायम है और प्रदर्शनकारी छात्रों के मामलों को लेकर गंभीरता से विचार कर रही है।
छात्रों और गंभीर आरोपियों के मामलों को अलग करने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सबसे पहले उन मामलों को अलग करना होगा जिनमें केवल छात्र शामिल हैं और उन मामलों को भी अलग रखना होगा जिनमें गंभीर आपराधिक गतिविधियों के आरोप हैं। न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि आपराधिक मामलों को वापस लेने के लिए कानून में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने का प्रावधान मौजूद है और उसी प्रक्रिया का पालन किया जा सकता है।
‘आपराधिक इतिहास’ की अदालत ने दी स्पष्ट व्याख्या
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से यह सवाल उठाया गया कि पिछली सुनवाई में प्रयुक्त “आपराधिक इतिहास” शब्द की स्पष्ट व्याख्या होनी चाहिए, क्योंकि इसमें छोटे-मोटे मामलों या पुराने राजनीतिक आंदोलनों से जुड़े मुकदमे भी शामिल हो सकते हैं।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके आदेश में “आपराधिक इतिहास” का अर्थ केवल हत्या, दुष्कर्म और अन्य गंभीर एवं जघन्य अपराधों से जुड़े आरोपियों से है। अदालत ने कहा कि ऐसे लोगों को किसी भी तरह की राहत नहीं दी जाएगी।
सरकार ने 2,738 गंभीर आरोपियों की पहचान का दावा किया
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि अब तक 2,738 ऐसे लोगों की पहचान की गई है जिन पर हत्या या दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराधों के आरोप हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगी।
हाई-पावर जांच समिति पर भी हुआ विचार
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने पूरे मामले की स्वतंत्र जांच के लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति गठित करने की मांग की। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत दो विकल्पों पर विचार कर रही है। पहला, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की विशेष जांच टीम द्वारा जांच और दूसरा, किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र समिति का गठन।
फेशियल सर्विलांस पर भी उठे सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि प्रदर्शन स्थल पर बड़े पैमाने पर चेहरे की पहचान संबंधी तकनीक का उपयोग किया गया, जबकि प्रदर्शनकारियों की सहमति नहीं ली गई। इसे निजता के अधिकार का उल्लंघन बताते हुए इस डेटा के उपयोग और संरक्षण पर भी सवाल उठाए गए।
सुनवाई के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों को राहत देने के पक्ष में है, लेकिन छात्रों की आड़ में हिंसा या गंभीर अपराध करने वालों को किसी भी प्रकार का संरक्षण नहीं मिलेगा। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी पुलिस अधिकारी द्वारा कानून से परे जाकर कार्रवाई की गई है तो उसे भी बख्शा नहीं जाएगा।
